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अंतरराष्ट्रीय अनाज प्रसंस्करण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र

                 

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल, गेहॅूं और अन्य खाद्यान्नों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। वैश्विक बाजार में खाद्यान्नों की भारी मांग से भारतीय खाद्यान्न उत्पादों के निर्यात के लिए उत्कृ्ष्ट वातावरण सृजित हो रहा है। अब, वैश्विक बाजार में भारी मांग और देश के अधिशेष उत्पा‍द को देखते हुए, देश ने निर्यात पर से प्रतिबंध हटा लिया है, किंतु केवल सीमित मात्रा में वस्तुओं के निर्यात की अनुमति है। निर्यात किए जाने वाले खाद्यान्नों की आंशिक अनुमेय मात्रा से न तो घरेलू कीमतों पर न ही भंडारण की स्थितियों पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव पड़ेगा।


महत्वपूर्ण खाद्यान्न हैं: गेहॅूं, धान, ज्वार, बाजरा, जौ और मक्का आदि। भारत के कृषि मंत्रालय द्वारा वर्ष 2011-12 के लिए दिए गए अंतिम अनुमान के मु‍ताबिक, प्रमुख खाद्यान्नों जैसे चावल, मकई और बाजरा का उत्पादन क्रमश: 105 मिलियन टन, 21.76 मिलियन टन और 10.28 मिलियन टन रहा। भारत न केवल खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक है बल्कि साथ ही विश्व में खाद्यान्न उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यातक भी है। वर्ष 2012-13 के दौरान भारतीय खाद्यान्नों का निर्यात 52567.81 करोड़ रुपए रहा। भारत के कुल खाद्यान्न निर्यात में चावल (जिसमें बासमती और गैर बासमती दोनों शामिल है) का है, जो इस अवधि के दौरान 64.40 प्रतिशत था। जबकि, इस अवधि के दौरान गेहूँ सहित अन्य खाद्यान्नों की हिस्सेदारी भारत से निर्यात किए कुल खाद्यान्नों में 35.60 प्रतिशत है। इस अवधि के दौरान भारत के खाद्यान्नों के प्रमुख आयातक देश थे ईरान, साऊदी अरब, इंडोनेशिया, संयुक्ति अरब अमीरात और बांग्लादेश।


अन्नस (ग्रेन) शब्द सामान्यत: घास परिवार (Poaceae) प्रजातियों और उपजातियों पर लागू होता है और इसमें स्यूगडासीरियल और अन्य खाद्यान्न शामिल हैं। खाद्यान्नों की दलाई/पिसाई (मिलिंग) को उद्योग के खाद्यान्न-प्रसंस्करण खण्ड में अत्यंत महत्वपूर्ण गतिविधि माना जाता है। फिलहाल भारत खाद्यान्न और अन्न के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से है, जिसमें लम्बे बासमती चावल का हिस्सा सबसे बड़ा है। इसके अतिरिक्त देश में हम मोटे अनाज (जौ, बाजरा, ज्वार आदि) की खेती करते हैं।



अभियान, दृष्टि, उद्देश्य (मिशन, विजन, ऑब्जेक्टिव)

हमारा विजन एक ऐसी दुनिया का है जिसमें गरीब, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, अधिक किफायती और व्यापक रूप से उपलब्ध अन्न – जिससे उनका भोजन अधिक प्रोटीन, वसा और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर हो - का उपभोग करते हुए अधिक स्व‍स्थ और खाद्य की दृष्टि से अधिक सुरक्षित रहें। हम संवर्धन खाद्यान्न की खेती के परिणामस्वरूप, विशेषकर मृदा में नाइट्रोजन की वृद्धि, भूमि के क्षय को कम करके भूमि के आवरण की वृद्धि, परिवार के मवेशियों के स्वास्थ्य में सुधार लाने वाली उन्नत चारा गुणवत्ता , और आर्थिक धारणीयता और लचीलेपन में वृद्धि करने वाले अन्न् और चारे की बाजार में संवर्धित बिक्री के माध्य्म से, अधिक धारणीय और लाभकारी लघु पट्ठेदार कृषि प्रणाली की परिकल्पना भी करते हैं।


हमारा मिशन विश्व के निर्धनतम क्षेत्रों में उपजाए जाने वाले खाद्यान्न के उत्पादन, मूल्य और पोषक गुणवत्ता में वृद्धि करना है, जिससे छोटे किसान परिवारों की गरीबी, भूख और कुपोषण घटेगा जबकि उनकी कृषि प्रणालियों की धारणीयता में सुधार होगा। अगर अधिक विशिष्ट तौर पर कहा जाए, तो हम इस मिशन को नीचे दिए गए उद्देश्यों के जरिए पूरा करते हैं। अनाज फलियों से विविध कृषि व्यवस्थाओं में इन फसलों की उत्पादकता और स्थायीत्व में सुधार होता है। धान्य् फलियों से भागीदारों और किसानों पर से उत्पादकता का दबाव कम होता है, वे प्रौद्योगिकी अपनाने में आने वाले अवरोधों पर काबू पा सकते हैं और उत्पादन के जोखिमों का प्रबंधन कर पाते हैं। उच्च् और अधिक विश्वसनीय पैदावार के साथ नई किस्में अधिकाधिक किसानों तक पहुँच रही हैं, विशेषकर अलाभकारी भूमियों पर खेती करते हैं। संवर्धित फसलों से घरेलू खाद्य आपूर्तियां और आय में सुधार हो रहा है।


गतिविधियां

केंद्र की प्रमुख गतिविधियां निम्नानुसार हैं:

  1. अनाजों (खाद्यान्न, मोटे अनाज, दालें) पर आधारित खाद्य उद्योगों को सहायता।
  2. अन्न निर्यातकों की समस्याओं का समाधान करना।
  3. एशियाई क्षेत्र पर ध्यान देते हुए विश्व भर में प्रशिक्षण के जरिए कौशल सृजित करना।
  4. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग।
  5. अन्न, ग्रास और मोटे अनाज के साथ नवीन प्रक्रियाएं और उत्पाद
  6. डिजाइन और हाथ अनाज प्रसंस्करण उद्योग के लिए मिलों और हलर्स संचालित मिनी मिलों, बहुमुखी मिलों, के रूप में उपकरणों की विस्तृत श्रृंखला के विकास ।
  7. अनेक लोकप्रिय और पारंपरिक खाद्यों के लिए तैयार मिश्रण हेतु प्रक्रियाओं का विकास।
  8. अन्न रसायन, खाद्यान्नों एवं दलहन और उनके उत्पादों की गुणवत्ता पर मौलिक अनुसंधान।